मोतियाबिंद जितना कम पके, मरीज़ उतना जल्दी हो चंगा,
कच्चा कटवाने को नहीं कहते, पर डॉक्टर कहे तो मत हो तंगा।
मोतियाबिंद कोई फल नहीं, जो पूरा पकने का इंतज़ार हो,
ज़्यादा देर करने में डर है ज़्यादा, फटने का खतरा तैयार हो।
मोतियाबिंद का ऑपरेशन होता है बस एक ही बार, सस्ते के लालच में मत करना हज़ार विचार,
अब ज़रूरत के हिसाब से लगती है लेंस, वरना हो सकती है मुश्किल बहुत ज़्यादा।
समझ नहीं आता ये बात मुझे, ऐसा क्यों होता है हर बार?
मोतियाबिंद के ऑपरेशन से महंगा, बनवाया जाता है चश्मा।
आंख के अंदर लगने वाली लेंस, सस्ती चुनी जाती है,
पर लोगों को दिखने वाला चश्मा, महंगे दाम का लिया जाता है।
डॉक्टर की कम फीस भी बहुत महंगी लगती है,
पर थियेटर और शॉपिंग मॉल में हज़ारों उड़ जाते हैं।
मोतियाबिंद के हर मरीज़ को, कुछ सालों बाद आती है झिल्ली,
लेज़र से फिर उसमें, करनी पड़ती है छोटी खिड़की।
मोतियाबिंद का ऑपरेशन कब करवाना चाहिए?
चश्मे के साथ भी दूर की चीज़ अगर लगे धुंधली,
समय आ गया है अब, ऑपरेशन करवा डालो।
रात में देखने में तकलीफ हो और रोशनी फैल जाए,
अब देर मत करो बहुत, मोतियाबिंद न बढ़ जाए।
मोतियाबिंद का ऑपरेशन अब, किसी भी मौसम में हो सकता है,
सर्दी, गर्मी या बारिश, मोतियाबिंद कभी भी उतारा जा सकता है।
रात में लाइट फैले और गाड़ी चलाते समय धुंधला दिखे,
मोतियाबिंद की निशानी है ये, अब देर मत करो, समझ लो।
आज नहीं तो कल करवाना ही है, मोतियाबिंद तो होना तय है,
फिर इंतज़ार क्यों कर रहे हो, दर्द सहने का क्या फायदा?
चश्मे का नंबर हर बार बदलता है, फिर भी धुंधला दिखता है,
अब समझ लो ये इशारा, ऑपरेशन का समय आ गया है।
बेटा-बेटी अपने काम में व्यस्त, और आप इंतज़ार करते हो कब तक?
नज़र अच्छी हो तभी तो, बिना सहारे ज़िंदगी ठीक से चलती है।
एक ही दिन की छोटी प्रक्रिया है, और उसी शाम घर वापस,
डरने की ज़रूरत नहीं अब, विज्ञान बहुत आगे बढ़ चुका है।
मोतियाबिंद पूरा पकने तक इंतज़ार करना, पुरानी बात है अब गलत,
आजकल छोटा मोतियाबिंद भी, ऑपरेशन में ले लिया जाता है।
मोतियाबिंद के साथ चश्मे से भी, छुटकारा अब संभव है,
मल्टीफोकल लेंस लगाकर, दूर-पास दोनों काम है।
हर किसी के लिए सही न हो, डॉक्टर से बात कर लेना,
अपनी ज़रूरत समझकर ही, सही लेंस चुन लेना।
फूली जितनी देर से कटवाओ,
आंख की पुतली पर निशान उतना ही रह जाए।
फूली दोबारा होने का खतरा कम करना हो तो,
नई त्वचा लगाने वाला ऑपरेशन करवाना चाहिए।
फूली रोज़ थोड़ी-थोड़ी बढ़ती है, इसीलिए तकलीफ देर से समझ आती है,
अगर बार-बार लाल हो जाए, तो ऑपरेशन के बारे में सोच लो,
जितनी देर से कटवाओगे, उतना ज़्यादा निशान पुतली पर रह जाएगा।
छोटी फूली है कहकर, बहुत लंबे समय तक मत टालो,
बड़ी हो जाएगी तो पुतली तक पहुंच जाएगी, फिर पछताना पड़ेगा।
आंख बार-बार लाल रहती है, और जलन भी साथ लाती है,
छोटा सा ऑपरेशन है ये, हमेशा के लिए राहत देता है।
ग्लूकोमा के ज़्यादातर मरीज़ों को, दूर का साफ ही दिखता है,
कोई तकलीफ नहीं मुझे, ऐसा सोचकर बैठे मत रहो।
डायबिटीज़ और बीपी की तरह, ग्लूकोमा भी धीमी बीमारी है,
ये सब आखिरी सांस तक, आपके साथ रहने वाले हैं।
अगर आपको ग्लूकोमा है, तो बूंदें रोज़ डालो,
नज़र जाने का रहेगा खतरा, सहन नहीं होगा वो बोझ।
ग्लूकोमा में बढ़ जाता है, आंख का एक दबाव,
आंख की नस सूख जाती है, कम हो जाती हैं नसें।
ग्लूकोमा को स्वीकार करने में, कोई शर्म मत रखो,
दवा रोज़ लो, बस यही एक नियम निभाओ।
लाल आंखों के होते हैं कई प्रकार, खुद इलाज मत करो कभी भी,
अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी मारोगे, इसीलिए कह रहा हूं आपको।
आंखें खुजलाएं और पानी बहे, मौसम बदलते समय अक्सर,
एलर्जी है ये आम बात, डॉक्टर की दवा से ठीक हो जाती है।
ज़्यादा खुजलाओ मत आप, हाथ रखो दूर,
ज़्यादा मलने से बढ़ेगी तकलीफ, नज़र रहेगी अधूरी।
चश्मे के नंबर के होते हैं कई प्रकार,
प्लस, माइनस और तिरछे भी।
माइनस इधर-उधर मिल जाता है,
प्लस और तिरछा ढूंढना पड़ता है।
कभी सब मिल जाते हैं साथ,
और कभी अलग-अलग रहते हैं,
जैसा भी नंबर मिले आपको,
पर चश्मा तो पहनना ही पड़ेगा।
माइनस मतलब दूर का, और नज़दीक का होता है प्लस,
ऐसा हमेशा नहीं होता, ये मत मान लेना।
तेज़ी से बढ़े अगर माइनस नंबर,
ये बात याद रखना,
रफ़्तार रोकने आया है 0.01% एट्रोपीन,
चाहे वो काइट्रो हो, या माय-एट्रो, या फिर मायोपिन।
पुराने चश्मे दराज़ में पड़े हैं, बेकार लगते हैं आपको भले ही,
किसी गरीब की ज़िंदगी में, रोशनी बन सकते हैं वो पल।
दान कर दो पुराने चश्मे, क्लिनिक पर आकर दे जाओ,
एक छोटा सा काम आपका, किसी और की दुनिया रोशन कर देगा।
नंबर हो अगर बहुत ज़्यादा, रेटिना रहता है पतला,
नियमित जांच करवानी पड़ती है, इसमें आलस मत करो।
सीधी लाइन टेढ़ी दिखे, या लाइट के आसपास बने घेरे,
एस्टिग्मेटिज्म है उसका नाम, कॉर्निया के आकार के फेरे।
साधारण चश्मे से भी सुधरे, या लेसिक से हो स्थायी ठीक,
नज़रअंदाज़ मत करो ये तकलीफ, जांच करवाओ सही तरीके।
चश्मा पोंछो सूती कपड़े से, मत रगड़ो शर्ट के छोर से,
एंटी-ग्लेयर कोटिंग उखड़ जाए, गलत सफाई की आदत से।
पानी से धोकर फिर पोंछो, धूल के कण निकाल दो,
गलत तरीके से साफ करने से, नंबर साफ न दिखे, ध्यान रखो।
अगर रहते हो पूरा दिन, कंप्यूटर पर काम करते हुए,
दो-चार बातें सुन लो, मैं कह रहा हूं ऐसे।
स्क्रीन से दो फुट की, रखो आप दूरी,
नीली किरणों को रोको, जाने से आंख के अंदर।
हर घंटे ब्रेक लो, पांच मिनट का,
आंख को आराम दो, कम होगी थकान।
बीच में देखो कोई ऐसी चीज़, जो हो सबसे दूर,
बनाए रखने में मदद करेगा, आपकी आंखों का नूर।
याद रखकर आप सब, पलकें झपकाते रहो,
हर दो घंटे में, एक गिलास पानी पियो।
खाने में बढ़ा दो, अलसी, अखरोट, बादाम,
लंबे समय तक आपको, आंखें देंगी साथ।
मोबाइल-टीवी में बच्चा रहता है, घंटों तक डूबा हुआ,
नंबर बढ़ने का खतरा बढ़ता है, रखो थोड़ी नज़र चुपचाप।
रोज़ थोड़ा समय बाहर खिलाओ, धूप में ले जाओ,
आंखों की सेहत के लिए, प्रकृति से बेहतर कोई उपाय नहीं।
डॉक्टर की फीस औसतन, सिनेमा के टिकट से सस्ती,
फिर भी कइयों को लगे ज़्यादा, ऐसी है अपनी बस्ती।
एक करता है आपको खुश, दूसरा दूर करता है दुख,
फीस उसकी रोज़ी-रोटी है, मत छीनो उसका ये सुख।
अच्छा लगे इसलिए बूंदें, खुद से बंद मत करना कभी भी,
डॉक्टर ने जितने दिन कहा हो, उतने दिन जारी रखना।
आंख लाल हो और चिपचिपाहट जमे, दवा खुद से मत लेना,
डॉक्टर को दिखाए बिना, घरेलू नुस्खे मत आज़माना।
बूंदें डालो सही तरीके से, उंगली मत लगाओ पुतली को,
डॉक्टर ने जैसा कहा वैसे डालो, कोई दिन मत छोड़ना।
बूंद की बोतल खोलने के बाद, एक महीना ही चलती है,
पुरानी बोतल इस्तेमाल करना टालो, भले आधी भरी हो।
फ्रिज में रखने वाली बूंदें हों तो, बाहर ज़्यादा देर मत रखना,
डॉक्टर के बताए अनुसार संभालो, कोई लापरवाही मत करना।
ऑपरेशन का खर्च सुनकर, पीछे मत हटना कभी भी,
बीमा या किश्तें उपलब्ध हैं, पूछ लेना हमसे।
एक डॉक्टर की बात पसंद न आए, तो दूसरे से जाकर पूछ लेना,
पर फैसला लेने में देर करके, नज़र मत गंवा बैठना।
डॉक्टर की सलाह के बिना स्टेरॉयड ड्रॉप्स, खुद मत इस्तेमाल करो कभी,
ग्लूकोमा और मोतियाबिंद दोनों, ये ड्रॉप्स ला सकते हैं यही।
आराम लगे तुरंत इसलिए, लंबे समय तक मत रखो जारी,
डॉक्टर ने जितना कहा उतना ही, समय पर करो बंद, ये है ज़िम्मेदारी।
माता-पिता या दादा-दादी को हो ग्लूकोमा, तो आपको भी है खतरा,
फैमिली हिस्ट्री बताओ डॉक्टर को, मत छुपाओ इसे धीरे से।
वंशानुगत बीमारियां जल्दी पकड़ में आएं, अगर हो जानकारी परिवार की,
जांच करवाओ नियमित रूप से, मत रखो लापरवाही किसी तरह की।
डायबिटीज़ पुरानी हो अगर, आंख की जांच करवाओ,
रेटिना को नुकसान होता है, समय रहते संभल जाओ।
नज़र अच्छी हो फिर भी, जांच मत छोड़ना कभी भी,
डायबिटीज़ में आंख का नुकसान, चुपचाप पैर पसारता है।
आंखें जलें और किरकिरी लगे, पानी होते हुए भी सूखी रहे,
बूंदें नियमित डालोगे तो, तकलीफ धीरे-धीरे मिट जाएगी।
ड्रॉप्स से भी राहत न मिले अगर, और आंखें सूखी रहा करें,
पंक्टल प्लग का विकल्प है, आंसुओं को रोक रखे अंदर।
कृत्रिम आंसू बार-बार डालना, कोई बुरी आदत नहीं है,
डॉक्टर के बताए अनुसार इस्तेमाल करो, इसमें कोई नुकसान नहीं है।
छोटे बच्चे की आंख जंचवाओ, पढ़ाई शुरू होने से पहले,
आलस करके अगर छोड़ दिया, चश्मा देर से पता चलेगा।
बच्चे की आंख तिरछी लगे, हंसी में मत उड़ाओ,
छोटी उम्र में इलाज हो जाए, वरना सवाल हमेशा रह जाएगा।
एक आंख से कम दिखे, और दूसरी करे सारा काम,
छोटी उम्र में इलाज न हो तो, ये कमी हमेशा रह जाती है।
छह साल से पहले की जांच है, सबसे ज़्यादा असरदार,
जितनी देर करोगे, इलाज उतना मुश्किल हो जाएगा।
लाल और हरा रंग उलझन में डाले, ऐसा बच्चे को लगे कभी,
जांच करवा लो एक बार, स्कूल जाने से पहले।
महीना पहले जन्मा बच्चा हो, वज़न अगर हो कम,
आंख की खास जांच करवाओ, टालना मत इस मुद्दे को।
रेटिना का विकास अधूरा रह जाता है, छोटा खतरा है इसमें,
जल्दी जांच और इलाज से, नज़र बच जाती है समय पर।
बच्चे की आंख में फोटो खींचो और, सफेद चमक दिखे,
छोटी बात मत समझना इसे, जांच करवानी ज़रूरी है।
जल्दी जांच से बचती है नज़र, और बचती है ज़िंदगी भी,
आलस बहुत भारी पड़ता है, समझ लो ये बात।
तिरछी आंख का ऑपरेशन, उम्र देखकर करवाया जाता है,
छोटे बच्चे में जल्दी करो, नज़र सीधी हो जाएगी।
बड़ी उम्र में भी होता है, तिरछापन सीधा,
शर्माने की बात नहीं है, करवा लो बेझिझक थोड़ा।
एक ही ऑपरेशन में ठीक हो जाए, ये ज़रूरी नहीं हमेशा,
डॉक्टर कहे जितनी बार करवाओ, रखो धैर्य और विश्वास।
धूप में जाओ तो चश्मा पहनो, इसमें आलस मत करना,
यूवी किरणें रोकने वाला हो, रखे आंख को शक्तिशाली प्लस।
चालीस के बाद हर साल, आंख की जांच करवाओ,
छोटी बीमारी बड़ी बने उससे पहले, जल्दी संभल जाओ।
बचपन में एक बार, स्कूल से पहले जांच करवाओ,
जवानी में दो-तीन साल में, नियमित चेकअप करवाओ।
चालीस के बाद हर साल, आंखों की जांच जरूरी है,
साठ के बाद तो खास ध्यान, ग्लूकोमा-मोतियाबिंद की चिंता है।
चश्मे से थक गए हो अगर, और आंखें हों ठीक-ठाक,
लेसिक से मिल सकता है छुटकारा, नंबर का बोझ नहीं रहेगा।
चश्मे के बिना फोटो खिंचवाने का, सपना है कइयों का पुराना,
लेसिक से मुमकिन है ये, बस फैसला लेना है छोटा।
नौकरी में, खेल में, या शादी में, चश्मा बार-बार आड़े आता है,
एक ही बार फैसला लेकर, जियो चश्मे के बिना ज़िंदगी फिर से।
जांच करवाओ पूरी तरह से, जानो कि लेसिक के लायक हो या नहीं,
बिना जाने ना मत कहना, फैसला करो जानकर सही तरीके से।
नंबर ज्यादा हो और लेसिक न हो सके,
ICL है उसका हल, निराश मत हो, ये है सक्षम।
आंख के अंदर लगता है लेंस, कॉर्निया को छुए बिना,
पतली कॉर्निया हो तब भी, मिलती है चश्मे बिना नज़र।
कॉन्टेक्ट लेंस पहनो तो, सफाई का रखो ध्यान,
रात को सोते समय मत रखना, वरना बढ़ेगा नुकसान।
चश्मा संभालना आसान है, कॉन्टेक्ट देता है खुली नज़र,
दोनों के फायदे अलग-अलग हैं, समझकर चुनाव करो।
खेल-कूद या समारोह में, कॉन्टेक्ट देता है बहुत राहत,
पर सफाई न रखो तो, बढ़ती है तकलीफ बहुत ज़्यादा।
लेंस पहनो और आंख खुजलाए, लालिमा के साथ आए पानी,
एलर्जी है लेंस के केमिकल की, नज़रअंदाज़ मत करना इसे,
सॉल्यूशन बदलकर देखो, या लेंस का प्रकार बदलो,
फिर भी तकलीफ ठीक न हो तो, डॉक्टर से तुरंत मिलो।
तय समय से ज्यादा, लेंस पहनकर मत रखो कभी,
आंखों को ऑक्सीजन न मिले, और इंफेक्शन का खतरा बढ़े सही।
डॉक्टर के बताए अनुसार ही, रोज़ के घंटे गिनो,
आलस में लेंस पहने रखने की, आदत आज ही छोड़ दो।
लेंस पहनने से पहले हाथ धोओ, साबुन से अच्छी तरह,
पानी से लेंस धोने की गलती, कभी मत करना जीवनभर।
सोल्यूशन की बोतल खोलने के बाद, तय समय में ही इस्तेमाल करो,
लेंस का केस भी बदलते रहो, हर तीन महीने में नया लाओ।
आंख में कुछ गिर जाए तो, खुद से मत मलना कभी भी,
डॉक्टर के पास ले जाओ तुरंत, वरना बढ़ेगा नुकसान।
आंख में केमिकल पड़ जाए तो, पंद्रह मिनट पानी से धोओ,
डॉक्टर के पास पहुंचो फिर, समय बिल्कुल मत गंवाना।
आंख में चोट लगे और दर्द के साथ लालिमा आए,
खुद से मरहम लगाने की गलती, कभी मत करना।
कॉर्निया में घाव हो जाए तो, नज़र जाने का खतरा बहुत,
डॉक्टर के पास तुरंत जाओ, बिल्कुल भी देर मत करना।
पटाखे जलाओ तो चश्मा पहनो, और रखो हाथ दूर,
एक पल की लापरवाही, बन सकती है ज़िंदगी भर का दाग।
आंख में चिंगारी पड़ जाए तो खुद से, पानी से धो लो तुरंत,
मरहम या घरेलू उपाय करने से पहले, डॉक्टर के पास जल्दी जाओ।
रंग खेलो पर ध्यान रखो, आंख में रंग न जाए,
केमिकल वाले रंगों से, कॉर्निया को नुकसान होता है।
वेल्डिंग करो तो गॉगल्स पहनो, लापरवाही मत बरतना,
आंख की किरणों का नुकसान, देर से दिखता है, समझ लो।
खेत में काम करो जब, धूल-मिट्टी से बचाव रखो,
चश्मा पहनकर काम करो तो, आंखों को मिलेगी राहत।
बरसात में आंख का संक्रमण बढ़ता है, गंदे पानी से सावधान रहो,
आंख लाल हो या चिपचिपाहट जमे, डॉक्टर को तुरंत दिखाओ।
पूल में तैरने जाओ तो, गॉगल्स पहनना मत भूलना,
क्लोरीन वाला पानी आंख में जाए तो, जलन बहुत होती है।
बाहर निकलो सड़क पर, धूल-धुआं हो बहुत,
चश्मा पहनकर निकलो तो, आंख को मिलेगी अच्छी सुरक्षा।
क्रिकेट, बैडमिंटन खेलो तब, गेंद लगने का खतरा रहता है,
छोटे बच्चों को खासकर समझाओ, सुरक्षा का महत्व बताकर।
फैक्ट्री या वर्कशॉप में काम करो, सेफ्टी गॉगल्स पहनना मत भूलो,
चिंगारी, धूल या केमिकल छींटे, आंखों को नुकसान पहुंचाए झूले।
एक पल की लापरवाही, जिंदगीभर का पछतावा लाए,
नियम मानो काम करते वक्त, सुरक्षा सबसे पहले आए।
सूर्यग्रहण देखने के लालच में, नंगी आंखों से मत देखो कभी,
रेटिना जलने का खतरा, तुरंत नहीं दिखता, पर नुकसान बढ़ाए सही।
खास ग्रहण चश्मा पहनकर ही, ये नज़ारा देख लेना,
फोटो या कांच के टुकड़े से, गलती से भी मत देखना।
मरने के बाद भी आंखें आपकी, किसी की दुनिया रोशन करें,
नेत्रदान कर जाओ, पुण्य का काम है ये सचमुच।
कॉर्निया धुंधली हो जाए अगर, और नज़र न रहे साबुत,
प्रत्यारोपण से मिलता है नया जीवन, विज्ञान का है ये अद्भुत तोहफा।
दान में मिली आंख से, किसी की दुनिया फिर से जगमगाए,
एक ही आंख का दान करके, दो लोगों की ज़िंदगी बदल जाती है।
आसमान में देखने पर दिखें, काले धब्बे या धागे जैसे,
बड़ी उम्र में आम बात है ये, घबराने की ज़रूरत नहीं ज़्यादा।
पर अचानक बढ़ जाए संख्या, या साथ में आए चमक,
जांच करवा लेना तुरंत, ज़्यादा मत सोचना।
अचानक दिखे बिजली जैसा, या पर्दा आ जाए आड़ा,
रेटिना खिसकने की निशानी है ये, समय मत गंवाना।
रेटिना का ऑपरेशन है, जितनी जल्दी उतना अच्छा,
देर करोगे जितनी, उतना नज़र का खतरा बढ़ेगा।
मक्खी उड़ती दिखे या चमक बार-बार आए,
छोटी बात समझकर मत टालना, जांच करवाओ सही समय पर।
पुराने धब्बे आसमान में घूमते हैं, ये है आम बात,
पर नए धब्बे अचानक बढ़ें, साथ में आए बिजली जैसी चमक।
ये फर्क समझना ज़रूरी है, दोनों को एक मत समझना,
शक हो तो इंतज़ार मत करना, तुरंत डॉक्टर से मिलना।
चालीस साल में नज़दीक का धुंधला दिखे, ये कोई बीमारी नहीं है,
प्राकृतिक है ये बदलाव, इसमें डरने जैसी कोई बात नहीं।
अखबार दूर रखकर पढ़ो, या नंबर लगे छोटा,
अब ज़रूरत है चश्मे की, बहाना मत बनाओ।
प्रोग्रेसिव या बाइफोकल, दोनों में है सुविधा,
डॉक्टर की सलाह लेकर चुनो, ज़िद मत रखना।
काजल-मस्कारा लगाओ भले ही, पर रात को साफ कर लेना,
आंख के किनारे पर रह जाए मेकअप तो, संक्रमण का खतरा होता है।
पुराना काजल फेंक देना, साल पूरा होने पर,
आंख की देखभाल करनी हो तो, छोटी सावधानी ही बहुत है।
आंख की एक्सरसाइज़ करने से, नंबर चला जाता है ऐसा कहा जाता है,
पर सच्ची बात ये है कि, नंबर एक्सरसाइज़ से नहीं मिटता।
गाजर खाने से नंबर जाता है, ये बात है अधूरी,
अच्छा खाना रखे स्वस्थ, पर नंबर की दवा है अलग।
ब्लू लाइट चश्मा पहनने से, सब कुछ ठीक हो जाए ऐसा नहीं,
आंखों की थकान थोड़ी कम हो, पर चमत्कारी इलाज नहीं।
स्क्रीन ब्रेक और पलकें झपकाना, यही है सही उपाय,
ब्लू लाइट चश्मा मददगार है, पर अकेला काफी नहीं।
सीधी लाइन टेढ़ी दिखे, या बीच में पड़े धब्बा,
उम्र के साथ होने वाली ये तकलीफ, जल्दी जांच से रहती है काबू में।
नंबर तेज़ी से बढ़ता रहे और, चश्मे से भी साफ न दिखे,
केराटोकोनस हो सकता है ये, जांच करवानी ज़रूरी है।
आंख मलने की आदत छोड़ो, खासकर रात को,
केराटोकोनस बढ़ने का कारण, यही आदत बनती है अक्सर।
एलर्जी के कारण खुजली होती है, और आंख मलने की आदत पड़ती है,
लगातार मलने से कॉर्निया पतली होती है, केराटोकोनस की ओर बढ़ती है।
एलर्जी की दवा लेने से, खुजली काबू में आती है,
आंख मलने की आदत छोड़ो, नज़र बचाने में ये काम आती है।
घर में गिरने का कारण, आधा है कमज़ोर नज़र,
मोतियाबिंद निकलवा लो समय पर, टालो गिरने का डर।
उम्र हो गई इसलिए मत करवाना, ऐसी गलती मत करना,
अस्सी साल में भी होता है ऑपरेशन, हिम्मत रखकर आगे बढ़ो।
मैकुलर डिजनरेशन या कमज़ोर नज़र हो, फिर भी निराश मत होना,
मैग्नीफायर और खास चश्मों से, पढ़ना फिर से शुरू करना।
पूरी नज़र वापस न आए तो भी, बची हुई नज़र का भरपूर उपयोग,
लो विज़न एड्स से मिलता है, रोज़मर्रा के कामों में सहयोग।
शाम होते ही धुंधला दिखे, अंधेरे में न सूझे रास्ता,
विटामिन ए की कमी हो सकती है, जांच करवाओ, परेशान मत रहो।
हरी सब्ज़ियां और गाजर खाओ, आंख को मिलेगा भरपूर पोषण,
छोटी सी ये सावधानी रखो तो, नज़र हमेशा रहेगी तेज़।
सिगरेट पीते हो? जान लो ये बात,
मोतियाबिंद और मैकुलर डिजनरेशन, दोनों का खतरा बढ़ाए ये आदत।
आंखें बचानी हो जिंदगीभर, तो छोड़ दो ये लत,
धुआं नुकसान करता है फेफड़ों के साथ, नज़र को भी उतनी ही तेज़ी से।
ड्राइविंग लाइसेंस बनवा रहे हो? आंखों की जांच है जरूरी,
रंग पहचानने की और दूर की नज़र, दोनों चेक होती है पूरी।
नंबर छुपाकर लाइसेंस बनवाना, अपनी ही जान से खिलवाड़ है,
सड़क पर दूसरों की सुरक्षा भी, आपकी नज़र से जुड़ी है।
रात में कम दिखे और, धीरे-धीरे सिकुड़े नज़र,
रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा हो सकता है, वंशानुगत है ये असर।
परिवार में ऐसा इतिहास हो तो, जल्दी जांच करवा लेना,
जेनेटिक काउंसलिंग की मदद भी, डॉक्टर से ले लेना।
अचानक नज़र चली जाए, या बिजली सी चमक तीव्र,
दौड़ो तुरंत डॉक्टर के पास, न रखो कोई धीरज।
आंख में केमिकल गिरे या चोट लगे गहरी,
मिनट की भी कीमत है, न करो कोई देरी।
पर नंबर बदले धीरे धीरे, या हल्का धुंधला दिखे,
रूटीन अपॉइंटमेंट ही काफी, जल्दबाज़ी न करें।
गाजर पालक और हरी सब्ज़ी, आंखों को दे ताकत,
अलसी अखरोट बादाम खाओ, बनी रहे नज़र दिन-रात।
ओमेगा-3 मिले अलसी से, आंसू रखे नम,
स्क्रीन के सामने बैठो तो भी, ड्राय आई का न रहे गम।
आंख फड़के तो शुभ-अशुभ, सोचना छोड़ दो,
थकान या नींद कम होने का कारण है ये, आराम कर लो।
लंबे समय तक फड़कती रहे, तो डॉक्टर को दिखा देना,
छोटी तकलीफ भी कभी-कभी, बड़ी बात का इशारा करती है।
आंख में अचानक लाल धब्बा दिखे, घबराने की ज़रूरत नहीं कोई,
खांसी-छींक या बीपी के कारण, छोटी नस फट जाती है।
अपने आप ठीक हो जाता है ये, दो हफ्तों में धीरे-धीरे,
फिर भी एक बार दिखा देना, बीपी भी चेक करवा लेना।
आंखें बाहर आती हुई लगें, या पलकें पूरी बंद न हों,
थायरॉइड का असर हो सकता है आंख पर, जांच करवाना ज़रूरी है।
पलकों के किनारे पर पपड़ी जमे, और सुबह आंख चिपके,
गर्म पानी की सिकाई से राहत मिलती है, साफ करो रोज़ धीरे से।
सिर दर्द होने से पहले, चमक या लकीरें दिखें,
माइग्रेन की ये निशानी है, डरने की ज़रूरत नहीं।
पर पहली बार हो तो दिखा देना, पक्का करने के लिए,
आंख की कोई और तकलीफ तो नहीं, ये जानना ज़रूरी है।
धूप या तेज़ रोशनी में आंख, बंद करने का मन करे,
छोटी तकलीफ समझकर मत टालना, वजह कई हो सकती हैं।
गर्भावस्था में आंख का बीपी भी, जंचवाना है ज़रूरी,
डायबिटीज़ या बीपी हो तो, रेटिना की जांच मत टालना।
नंबर बदल जाता है थोड़ा-बहुत, गर्भावस्था के दौरान ये आम है,
डिलीवरी के बाद स्थिर हो जाए, तब करवाना चश्मे में बदलाव।
पलक पर सूजन आ जाए, और दर्द भी साथ लाए,
गुहेरी है ये आम संक्रमण, घबराने की कोई बात नहीं।
खुद से फोड़ने की कोशिश, गलती से भी मत करना,
डॉक्टर की दवा से ठीक होती है, थोड़ा धैर्य रखना।
ऑपरेशन के बाद आंख को, धूल-मिट्टी से रखो दूर,
पानी अंदर मत जाने देना, नहाते समय रहना सावधान।
डॉक्टर की दी हुई बूंदों की सूची, ठीक से फॉलो करो रोज़,
चेकअप के लिए आना मत भूलना, यही है सबसे बड़ा फर्ज़।
मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद, कभी-कभी बढ़ जाता है आंख का दबाव,
नियमित चेकअप में इस पर भी, डॉक्टर रखते हैं नज़र।
मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद, सालों बाद फिर धुंधला दिखे,
ये नया मोतिया नहीं, पुराना पर्दा है, घबराने की बात नहीं।
लेज़र से खुलता है वो पर्दा, पांच मिनट की है बात,
बिना दर्द की ये प्रक्रिया, नज़र वापस लाए साफ।
ऑपरेशन का नाम सुनकर, डर क्यों जाते हो इतना?
दस-पंद्रह मिनट की प्रक्रिया है ये, दर्द या घाव नहीं रहता।
पुरानी बातें सुनकर डरना मत, ज़माना बदल चुका है बहुत,
टेक्नोलॉजी इतनी आगे है अब, डरने की कोई वजह नहीं।
पड़ोसी ने करवाया और ठीक हो गया, आप क्यों कर रहे हो इंतज़ार?
हज़ारों मरीज़ करवा चुके हैं, आप अकेले क्यों उलझन में हो?
आज का काम कल पर मत टालो, आंख के मामले में खासकर,
देर करने से बढ़ती है तकलीफ, और घटती है सफलता की उम्मीद।
माता-पिता की आंखों का ध्यान, बेटे की है पहली ज़िम्मेदारी,
छोटा निवेश है ऑपरेशन में, बड़ा है उसका फायदा।
अपने मम्मी-पापा से पूछो, आखिरी बार कब करवाया चेकअप,
आलस में मत रहने देना, नज़र है अनमोल गहना।
घर और गाड़ी पर खर्च, बिना सोचे कर देते हो,
आंखों पर खर्च करते समय क्यों, इतना ज़्यादा सोचते हो?
मुफ्त जांच करवाने के लालच में, अपनी आंख दांव पर मत लगाना,
जिस डॉक्टर के पास समय ही न हो, वो क्या जांच करेगा ठीक से?
पांच मिनट में निपटा देते हैं जांच, और मोतियाबिंद दिखाकर डराते हैं,
पैसे वसूलने का धंधा है ये, सच्ची जांच कहां होती है इसमें?
आंख की पूरी जांच में, दबाव और रेटिना भी देखा जाता है,
मुफ्त के कैंप में इतना समय, किसी के पास कहां होता है?
सिर्फ नंबर चेक करके चश्मा पकड़ा देना, पूरी जांच नहीं कहलाती,
आंख के पर्दे तक की जांच के बिना, बीमारी छुपी रह जाती है।
फीस भरने का डर रखकर, जांच टालना है बड़ी गलती,
सस्ता ढूंढने जाने पर कभी-कभी, गंवानी पड़ती है नज़र की कीमत।
डॉक्टर की फीस उसकी मेहनत का मूल्य है,
उसे चुकाने में कंजूसी मत करना, याद रखना ये बात।
मुफ्त जांच के बहाने, फिर ऑपरेशन करवाने का दबाव डाला जाता है,
जल्दी फैसला लेने पर मजबूर करने के लिए, डरा-धमकाकर बात की जाती है।
अपनी मर्ज़ी और समय के हिसाब से, फैसला लेने का हक है आपका,
किसी के दबाव में आकर, जल्दबाज़ी मत करना।
मुफ्त में सिर्फ एक जगह जांच करवाकर, फैसला मत ले लेना,
अपने नियमित डॉक्टर को दिखाकर, तसल्ली कर लेना।
सस्ता और मुफ्त हमेशा अच्छा हो, ये ज़रूरी नहीं है,
आंखों के मामले में गुणवत्ता से, समझौता नहीं करना चाहिए।
जिस चीज़ की कीमत चुकाते हो, उसकी ज़िम्मेदारी भी होती है,
मुफ्त में मिली सलाह के पीछे, ज़िम्मेदारी कहां होती है?
गांव-गांव में कैंप लगते हैं, और जल्दबाज़ी में ऑपरेशन करवा लिया जाता है,
नतीजा अच्छा न आए तो, ज़िम्मेदार कौन, किससे पूछोगे तब?
पास के अच्छे डॉक्टर के पास जाकर, नियमित जांच करवाओ भले थोड़ा दूर हो,
एक बार की गलती भारी पड़ती है, नज़र है अनमोल, याद रखना ये बात।
मुफ्त के मोह में पड़कर, अपनी आंखें दांव पर मत रखना,
सही डॉक्टर, सही जांच, सही फीस — यही है सही रास्ता।
सफेद हिस्से पर पीला धब्बा दिखे, पर पुतली तक न पहुंचे जो,
पिंग्विकुला है उसका नाम, ऑपरेशन की जरूरत नहीं होती वो।
पटेरिजियम है उससे अलग, धीरे-धीरे पुतली की ओर बढ़े,
नज़र में रुकावट लाए तो, ऑपरेशन करवाना ही पड़े।
दोनों दिखने में लगें एक जैसे, पर इलाज है अलग-अलग,
डॉक्टर से जांच करवाओ, खुद निदान करने की आदत छोड़ो अभी।
वायरल कंजंक्टिवाइटिस फैलता है तेज़ी से, पानी जैसा स्राव हो,
बैक्टीरियल में गाढ़ा पीला चिपचिपा, सुबह आंख चिपक जाए जो।
एलर्जिक में खुजली है मुख्य, दोनों आंखों में साथ हो,
वर्नल में बच्चों को खास, मौसम बदले तो तकलीफ ज़्यादा हो।
चारों का इलाज है अलग-अलग, खुद दवा मत चुनो,
डॉक्टर को दिखाकर प्रकार जानो, फिर ही इलाज शुरू करो।
खेत में काम करते हुए आंख में, पेड़ का पत्ता या तिनका लगे,
फंगस के इंफेक्शन का खतरा, उससे तेज़ी से जागे।
सामान्य एंटीबायोटिक से न मिटे, और तकलीफ बढ़ती जाए,
फंगल अल्सर का शक हो तो, खास जांच करवानी चाहिए।
देर से पहचान और देर का इलाज, नज़र के लिए है खतरनाक,
पेड़-पौधे से चोट के बाद तकलीफ बढ़े तो, तुरंत जाओ डॉक्टर के पास।
आंख में सूजन और लालिमा रहे, सामान्य दवा से न मिटे,
दुर्लभ परजीवी संक्रमण हो सकता है, जो खास जांच में ही पकड़े।
तालाब या गंदे पानी के संपर्क में आने के बाद, अगर तकलीफ बढ़ जाए,
माइक्रोस्कोप जांच करवाओ, सही पहचान इसी तरह हो पाए।
विटामिन ए की कमी के अलावा भी, रतौंधी के कारण कई,
रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा या वंशानुगत तकलीफ, भी है उनमें कोई।
एक ही कारण मान मत लेना, डॉक्टर से जांच करवाना,
सही कारण जाने बिना, खुद उपाय मत आज़माना।
आंख के अंदरी परतों की, फोटो लेता है OCT,
ग्लूकोमा और रेटिना की बीमारी, जल्दी पकड़ी जाती है इससे।
पेरिमेट्री से चेक होती है, आपकी नज़र की चारों ओर की रेंज,
ग्लूकोमा में धीरे-धीरे घटे जो, पकड़ी जाती है इस जांच से चेंज।
OCT-एंजियोग्राफी दिखाती है, रेटिना की नसों की हालत,
सुई के बिना, दर्द के बिना होने वाली, ये है आधुनिक सुविधा।
एक बार की जांच काफी नहीं, नियमित फॉलोअप ज़रूरी है,
बीमारी बढ़ रही है या काबू में है, ये जानने के लिए ये जांच ज़रूरी है।
आंख को छुए बिना, हवा की फूंक से होती है जांच,
आंख का दबाव मापा जाता है तुरंत, नहीं होती कोई खास तकलीफ।
हर रूटीन चेकअप में, ये जांच करवानी ही चाहिए,
ग्लूकोमा की शुरुआत पकड़ी जाए जल्दी, नज़र न दिखे तब भी चाहिए।
दबाव ज़्यादा आए तो घबराने की ज़रूरत नहीं तुरंत,
और गहरी जांच के बाद ही, पहचान होती है सही तरीके से।
आंख में बूंदें डालकर पुतली बड़ी करके, रेटिना की पूरी जांच होती है,
डायबिटीज़, ग्लूकोमा और रेटिना की बीमारी, छुपी नहीं रह पाती है।
फोटोग्राफ लेने से रिकॉर्ड रहता है, अगली जांच से तुलना होती है,
बीमारी बढ़ रही है या नहीं, ये सटीकता से पता चलती है।
कॉर्निया की अंदरूनी परत में, कोशिकाओं की गिनती होती है,
मोतियाबिंद के ऑपरेशन से पहले, ये जांच ज़रूरी होती है।
कोशिकाएं कम हों अगर ज़्यादा, ऑपरेशन में रहती है ज़्यादा सावधानी,
स्पेक्युलर माइक्रोस्कोपी से पकड़ी जाती है, ये अहम जानकारी।
कॉर्निया के आकार का नक्शा, टोपोग्राफी से बनता है,
केराटोकोनस या अनियमित मोड़, जल्दी पकड़ में आता है।
लेसिक करवाने से पहले ये जांच, ज़रूरी मानी जाती है,
कॉर्निया लेसिक के लायक है या नहीं, यही तय की जाती है।
कॉर्निया कितनी मोटी है, पैकिमेट्री से मापी जाती है,
लेसिक और ग्लूकोमा की जांच में, ये माप काम आती है।
पतली कॉर्निया हो तो, दबाव का माप बदल जाता है,
सही पहचान करने के लिए, ये जांच ज़रूरी हो जाता है।
मोतियाबिंद बहुत घना हो और, रेटिना सीधी नज़र से न दिखे,
B-स्कैन अल्ट्रासाउंड से, अंदर की हालत पता चलती है सही।
रेटिना खिसकी है या नहीं, ये भी पकड़ में आता है इससे,
ऑपरेशन से पहले की ये जांच, ज़रूरी है कई कारणों से।
नस में खास रंग चढ़ाकर, रेटिना की नसों की फोटो ली जाती है,
डायबिटिक रेटिनोपैथी में, लीकेज कहां है ये पता चलती है।
लेज़र ट्रीटमेंट कहां करनी है, ये तय करने में मदद करती है,
रेटिना की नसों की सही हालत, यही जांच बताती है।
ग्लूकोमा दो प्रकार के होते हैं, खुले और बंद कोण वाले,
गोनियोस्कोपी से पता चलता है, कौन सा ग्लूकोमा है आपका।
इलाज की विधि बदलती है, प्रकार के अनुसार तय होती है,
इस जांच के बिना ग्लूकोमा का, सही इलाज नहीं हो पाती है।
आंसू की परत कितनी जल्दी टूटे, ये जांची जाती है खास तरीके से,
टियर फिल्म ब्रेकअप टाइम से, ड्राय आई पकड़ी जाती है सही तरीके से।
शिर्मर टेस्ट में कागज़ की पट्टी, पलक के नीचे रखी जाती है,
पांच मिनट में आंसू की मात्रा, कितनी है ये पता चलती है।
एक आंख बंद करके, चौकोर खानों वाले कागज़ को देखो,
लाइनें टेढ़ी या टूटी दिखें, तो डॉक्टर को तुरंत दिखाओ।
मैकुलर डिजनरेशन वाले मरीज़ों के लिए, घर पर रोज़ करने वाली ये जांच,
छोटा बदलाव भी जल्दी पकड़ में आए, रखे नज़र पर भरोसा कायम।
आंख के अगले हिस्से का, बारीक स्कैन लिया जाता है,
कॉर्निया, चेंबर और एंगल की हालत, साफ तरीके से पता चलता है।
बंद कोण वाले ग्लूकोमा की जांच में, खास उपयोगी माना जाता है,
सुई या छुए बिना ये जांच, जल्दी पूरी हो जाता है।
आंख लाल हो और दर्द के साथ, रोशनी सहन न हो,
यूवाइटिस हो सकता है ये, आम तौर पर समझ न हो।
शरीर की दूसरी बीमारियों से, कभी-कभी जुड़ी होती है,
जोड़ों का दर्द या त्वचा की तकलीफ, साथ में पूछी जाती है।
देर से पहचान हो तो, नज़र को नुकसान होता है ज़्यादा,
स्टेरॉयड और दूसरी दवाओं से, काबू में आती है ये तकलीफ ज़्यादा।
आंख का एक हिस्सा अचानक लाल हो, दर्द हो सामान्य,
एपिस्क्लेराइटिस है ये ज़्यादातर, गंभीर नहीं, रहें शांत।
खुद ही ठीक हो जाता है अक्सर, कुछ दिनों में धीरे,
फिर भी एक बार दिखा देना, यकीन करने डॉक्टर के पास।
एपिस्क्लेराइटिस से ये है ज़्यादा गहरा और दर्द तीव्र,
स्क्लेराइटिस माना जाता है गंभीर, इसे हल्के में मत लें, धीरे।
शरीर की ऑटोइम्यून बीमारी से, अक्सर जुड़ा होता है,
पूरी जांच करवाओ, इलाज में देर न हो कोई भी।
पलक के अंदर छोटी गांठ हो, दर्द भी न हो कभी,
कैलेज़ियन है उसका नाम, ग्रंथि बंद होने से होती है ये।
गर्म सिकाई करने से अक्सर, खुद ही घुल जाती है,
बड़ी रह जाए या बढ़ती जाए तो, छोटा ऑपरेशन करवाना पड़ता है।
एक पलक दूसरी से नीचे झुके, और नज़र में रुकावट आए,
पीटोसिस है उसका नाम, उम्र या कमज़ोर मांसपेशी से होता है।
बच्चों में हो तो जल्दी इलाज, आलसी आंख न बने इसलिए,
बड़ों में कॉस्मेटिक और नज़र की तकलीफ, दोनों के लिए ऑपरेशन होता है।
पलक अंदर की ओर मुड़े और पलकें आंख को रगड़ें,
एंट्रोपियन कहलाता है ये, जलन और चोट पहुंचाए।
पलक बाहर की ओर झुके तो, आंसू बाहर बहते रहें,
एक्ट्रोपियन कहलाता है ये, आंख सूखी भी रह सकती है।
दोनों में छोटा ऑपरेशन, स्थायी राहत देता है,
बुज़ुर्गों में आम तकलीफ, डॉक्टर से जंचवानी चाहिए।
माथे और पलकों पर छाले हों, दर्द के साथ तीव्र,
हर्पीज़ ज़ोस्टर आंख तक पहुंचे, माना जाता है गंभीर।
नाक की नोक पर छाला हो तो, आंख को खतरा बढ़ाता है,
तुरंत डॉक्टर को दिखाओ, दवा जल्दी शुरू करवाओ।
आंख के आसपास सूजन और लालिमा, बुखार के साथ बढ़े,
ऑर्बिटल सेल्युलाइटिस है ये गंभीर, इमरजेंसी माना जाता है।
बच्चों में तेज़ी से फैले, साइनस के इंफेक्शन से होता है,
दवा के बिना इंतज़ार मत करो, अस्पताल में भर्ती करवाओ।
एक आंख की नज़र अचानक धुंधली हो, रंग फीके लगें,
आंख हिलाने से दर्द हो, ऑप्टिक नर्व में सूजन जागे।
युवा उम्र के लोगों में ज़्यादा, कभी-कभी दूसरी बीमारी का संकेत,
पूरी जांच करवाओ, MRI भी ज़रूरी हो सकती है कभी।
सिरदर्द लगातार रहे, और उल्टी के साथ बढ़े,
आंख की अंदरूनी नस में सूजन, पैपिल्डेमा कहलाता है।
दिमाग के अंदर दबाव बढ़ने की, ये है एक निशानी,
जांच करवाओ तुरंत, लापरवाही मत बरतो कोई भी।
गंदे हाथों और मक्खियों से फैले, आंख का ये पुराना संक्रमण,
ट्रेकोमा कहलाता है ये, बार-बार हो तो पलकें मुड़ जाती हैं अंदर की ओर।
स्वच्छता रखने से रुकता है, हाथ-मुंह धोने की आदत से,
देर से पहचान हो तो, नज़र जाने का खतरा बढ़ जाता है।
आंखें लगातार हिलती रहें, इधर-उधर या गोल-गोल,
निस्टागमस कहलाता है ये, जन्म से या बाद में होता है ये फेर।
जन्मजात हो तो अक्सर, कम नज़र के साथ जुड़ा होता है,
अचानक बड़ी उम्र में शुरू हो तो, गहरी जांच करवानी पड़ती है।
पूरा इलाज न हो तब भी, चश्मे और मदद से सुधार आता है,
डॉक्टर की सलाह के अनुसार चलो, जीवन आसान बन जाता है।
त्वचा और बाल सफेद हों, और आंखें भी हल्के रंग की,
एल्बिनिज़्म में आंख की रेटिना, अधूरी रह जाती है विकास की।
रोशनी ज़्यादा सहन नहीं होती, और नज़र रहती है कम,
निस्टागमस भी साथ आता है, तकलीफ एक-दूसरे से जुड़ी हुई है।
टिंटेड चश्मे और मैग्नीफायर से, रोज़मर्रा का काम आसान बनता है,
पूरी नज़र न मिले तब भी, उपलब्ध मदद से जीवन जिया जाता है।
एक आंख की पुतली बड़ी, दूसरी छोटी दिखे,
एनिसोकोरिया कहलाता है ये, अक्सर बिना कारण भी होता है।
जन्म से ही थोड़ा फर्क हो, तो चिंता की बात नहीं,
अचानक फर्क बढ़ जाए तो, ये छोटी बात नहीं।
सिर में चोट या नस का दबाव, कारण हो सकता है अंदर का,
तुरंत डॉक्टर को दिखाओ, इंतज़ार मत करो इसका।
लड़कों में कलर ब्लाइंडनेस, लड़कियों से ज़्यादा देखने को मिलती है,
मां से विरासत में मिलती है, X गुणसूत्र के कारण चलती है।
पूरा इलाज नहीं है इसका, पर खास चश्मों से थोड़ी मदद मिलती है,
करियर चुनते समय, ये बात ध्यान में रखनी चाहिए।
जन्म से ही पुतली का आकार, चाबी के छेद जैसा हो,
कोलोबोमा कहलाता है ये, आंख के विकास में कमी हो।
नज़र पर असर कम-ज़्यादा, कमी की जगह पर निर्भर करता है,
नियमित जांच करवानी पड़ती है, दूसरी तकलीफें छूट न जाएं इसलिए।
आंख के रंगीन हिस्से की कमी, जन्म से ही होती है कभी,
एनिरिडिया कहलाता है ये, रोशनी सहन नहीं होती इसलिए थोड़ा अलग।
ग्लूकोमा और मोतियाबिंद का खतरा, साथ में ज़्यादा रहता है,
नियमित जांच जीवनभर, ज़रूरी बनी रहती है।
बच्चे की आंख की फोटो में, सफेद चमक दिखे अगर,
रेटिनोब्लास्टोमा की निशानी हो सकती है, गंभीरता से लीजिए।
छोटी उम्र में जल्दी पहचान, जीवन और नज़र दोनों बचाती है,
आलस या डर रखे बिना, तुरंत डॉक्टर के पास ले जाइए।
शरीर लंबा और पतला हो, उंगलियां लंबी हों जिसकी,
आंख के अंदर का प्राकृतिक लेंस, खिसक सकता है उसकी।
मार्फन सिंड्रोम से जुड़ी हुई, ये है एक तकलीफ,
नज़र अचानक बदल जाए तो, जांच करवानी है ज़रूरी बात।
नवजात बच्चे की आंख की जांच, जन्म के बाद तुरंत होती है,
रेड रिफ्लेक्स टेस्ट से, जन्मजात कमी पकड़ी जाती है।
तीन महीने में बच्चा आंखों से, चीज़ों को फॉलो करे ये देखिए,
न करे तो डॉक्टर को, तुरंत ही दिखा दीजिए।
बच्चा टीवी के पास जाकर बैठे, या किताब आंख के पास लाए,
नंबर की निशानी हो सकती है ये, ध्यान से देखिए, चूकिए मत।
आलस करके जांच मत टालिए, पढ़ाई पर असर पड़ता है,
छोटी उम्र की जांच, जीवनभर की नज़र बचाती है।
एक आंख का इस्तेमाल कम हो, और दिमाग उसे नज़रअंदाज़ करे,
छह साल के बाद इलाज मुश्किल, जल्दी उम्र में ही पकड़ा जाए अच्छे से।
पैच पहनाना पड़ता है कभी, अच्छी आंख पर थोड़े समय के लिए,
कमज़ोर आंख को काम कराने का, यही है साबित और सही तरीका।
उम्र बढ़े तो आंख की तीन बीमारियां, साथ आने की संभावना,
मोतियाबिंद, ग्लूकोमा और मैकुलर डिजनरेशन, इनकी अनदेखी मत करना।
एक बीमारी का इलाज करवाकर, दूसरी तरफ लापरवाही मत करना,
हर साल पूरी जांच करवाओ, ये बात याद रखना।
घर में गिरने के ज़्यादातर मामले, कमज़ोर नज़र से जुड़े होते हैं,
सीढ़ियों और दहलीज़ पर खास ध्यान, संभलकर चलना चाहिए।
मोतियाबिंद निकलवाने से गिरने का खतरा, काफी कम हो जाता है,
घर के लोगों को भी इस बात का, ध्यान रखना चाहिए, समझ आता है।
बीपी, डायबिटीज़ या दूसरी दवाएं, आंख पर भी असर डालती हैं,
डॉक्टर को सारी दवाएं बताओ, आंख की जांच के समय।
कुछ दवाएं ड्राय आई करती हैं, कुछ मोतियाबिंद बढ़ाती हैं,
पूरी जानकारी दिए बिना, सही इलाज नहीं मिल पाता है।
गेंद लगे या मुक्का पड़े, आंख के आसपास सूजन आए,
तुरंत बर्फ लगाओ हल्के से, दबाव मत डालो, ये ध्यान रखिए।
नज़र धुंधली हो या दोहरी दिखे, तो गंभीरता से लीजिए,
आंख के अंदर खून जम सकता है, तुरंत डॉक्टर को दिखाइए।
तार, कांच या तीखी चीज़ आंख में लगे तो,
खुद निकालने की कोशिश गलती से भी मत करो।
आंख और पलक बंद मत करो ज़बरदस्ती से,
साफ कपड़े से ढककर, दौड़ो अस्पताल की तरफ तेज़ी से।
नाखून लगे या टहनी छुए, और आंख में कुछ चुभे,
कॉर्नियल एब्रेज़न होता है जब, रोशनी से आंख मिचती है।
दर्द तीव्र होता है पर, ज़्यादातर जल्दी ठीक हो जाता है,
दवा के बिना खुद से मलहम, गलती से भी मत लगाना।
कॉन्टेक्ट लेंस पहनकर सोने की आदत से,
कॉर्नियल अल्सर होने का खतरा बढ़ता है तेज़ी से।
सफेद धब्बा दिखे कॉर्निया पर, दर्द और लालिमा के साथ,
देर से पहचान नज़र को स्थायी नुकसान पहुंचाती है, समझ लीजिए ये बात।
आंख की चोट के बाद मत रगड़ो, मत दबाओ, मत मसलो,
घरेलू उपाय या तेल-हल्दी, गलती से भी मत लगाना।
जितनी जल्दी डॉक्टर के पास पहुंचो, उतनी नज़र बचने की संभावना,
हर आंख की चोट को गंभीर मानो, कोई ढील मत देना।
जांच के बाद सवाल पूछने में, शर्माने की ज़रूरत नहीं,
समझे बिना घर चले जाना, ये सही तरीका नहीं।
ड्रॉप्स भूल जाओ तो, दोगुनी मत डालना कभी,
छूटा हुआ समय जाने दो, अगला समय नियम अनुसार सही।
ऑपरेशन के बाद तुरंत ही, पूरी साफ नहीं दिखेगा,
कुछ दिन धैर्य रखो, धीरे-धीरे नज़र सुधर जाएगा।
जहां जांच पूरी होती हो, और सवालों के जवाब मिलें,
ऐसे डॉक्टर पर भरोसा रखो, नज़र वहीं संभलती है भले।
मोनोफोकल लेंस लगवाने से, एक ही दूरी की नज़र साफ होती है,
दूर का साफ देखना हो तो, पास का काम चश्मे से होता है।
सबसे पुराना और भरोसेमंद विकल्प, सालों से इस्तेमाल होता है,
खर्च में भी किफायती, ज़्यादातर मरीज़ों के लिए सही होता है।
मल्टीफोकल लेंस लगवाने से, दूर-पास दोनों काम होता है,
ज़्यादातर चश्मे से छुटकारा, जीवन आसान हो जाता है।
रात में लाइट के आसपास घेरे, शुरुआत में थोड़े दिखते हैं,
दिमाग थोड़े समय में आदी हो जाता है, फिर तकलीफ कम हो जाती है।
हर किसी के लिए सही न हो, डॉक्टर से चर्चा कर लीजिए,
अपनी जीवनशैली समझकर, सही चुनाव कर लीजिए।
मोतियाबिंद के साथ एस्टिग्मेटिज्म भी हो, टेढ़ा नंबर जिसे कहते हैं,
साधारण लेंस से वो नंबर न जाए, टोरिक लेंस ही काम आता है वहां।
ऑपरेशन के समय ही सेट होता है ये, सही कोण और दिशा में,
बाद में चश्मे का नंबर कम होता है काफी, फायदा रहता है लंबे समय तक।
मोनोफोकल या मल्टीफोकल, दोनों प्रकार में टोरिक मिलता है,
एस्टिग्मेटिज्म हो तो डॉक्टर से, इस विकल्प के बारे में पूछ लीजिए।
पढ़ने का शौक है या ड्राइविंग करते हो रात में ज़्यादा,
कंप्यूटर पर काम है या बाहरी गतिविधि पसंद है आपको,
ये सारी बातें डॉक्टर को बताओ, खुलकर बात कर लीजिए,
अपनी ज़रूरत के अनुसार ही, सही लेंस चुन लीजिए।
लेज़र से कॉर्निया का आकार बदलता है, नंबर हमेशा के लिए चला जाता है,
आधे घंटे की प्रक्रिया है, बिना दर्द के हो जाता है।
कॉर्निया मोटी होनी ज़रूरी, और नंबर स्थिर होना चाहिए,
हर किसी को लेसिक नहीं होता, जांच करवा ही लेनी चाहिए।
कॉर्निया पतली हो और लेसिक न हो सके,
PRK है उसका विकल्प, नज़र साफ और सटीक बनती है इससे।
ठीक होने में कुछ दिन ज़्यादा लगते हैं, धैर्य रखना पड़ता है,
नतीजा लेसिक जितना ही अच्छा, समय के साथ दिखता है।
नंबर बहुत ज़्यादा हो और कॉर्निया पतली हो,
लेसिक और PRK दोनों न हो सकें, तब ICL ही सही होता है।
आंख के अंदर लगता है लेंस, प्राकृतिक लेंस को छुए बिना,
ज़रूरत पड़े तो निकाला भी जा सकता है, यही है इसकी खासियत अलग।
कॉर्निया पूरी तरह धुंधली या दाग वाली हो जाए जब,
पूरी कॉर्निया बदलनी पड़ती है, PK कहलाता है उसे तब।
दान में मिली कॉर्निया से, नई नज़र मिलती है वापस,
रिजेक्शन का खतरा थोड़ा रहता है, नियमित जांच ज़रूरी है सही सच।
कॉर्निया की सिर्फ अंदरूनी परत खराब हो तो,
पूरी कॉर्निया बदलने की ज़रूरत नहीं, बस उतना ही बदला जाता है।
DSEK कहलाती है ये विधि, छोटा सा छेद ही काफी है,
ठीक होना जल्दी होता है, PK से आसान माना जाता है।
ड्रॉप्स और लेज़र से भी दबाव कम न हो जब,
ट्रैबेक्युलेक्टॉमी करवानी पड़ती है, नया रास्ता बनाया जाता है तब।
आंख के अंदर का तरल, नए रास्ते से बाहर निकलता है,
दबाव काबू में रहता है, नज़र की नस बची रहती है भले।
ट्रैबेक्युलेक्टॉमी काम न करे, या बार-बार ज़रूरत पड़े,
ड्रेनेज वाल्व लगाया जाता है तब, दबाव काबू में रहे।
छोटी ट्यूब लगाई जाती है आंख में, तरल बाहर जाने के लिए,
जटिल ग्लूकोमा के मामलों में, ये तरीका बहुत उपयोगी माना जाता है।
साधारण कॉर्निया ट्रांसप्लांट भी असफल हो जाए जब,
कृत्रिम कॉर्निया लगाई जाती है, बोस्टन KPro कहलाता है तब।
अत्यंत जटिल मामलों में, दांत और हड्डी के टुकड़े का इस्तेमाल होता है,
OOKP कहलाती है ये विधि, आखिरी विकल्प के रूप में आज़माई जाती है।
बहुत कम केंद्रों में होता है ये, विशेषज्ञ डॉक्टर की ज़रूरत पड़ती है,
साधारण ट्रांसप्लांट असफल हो तभी, ये विकल्प सोचा जाता है।
बीमा कंपनी से जुड़े हॉस्पिटल में, बिना पैसे भरे इलाज होता है,
कैशलेस सुविधा कहलाती है इसे, अपनी जेब से कुछ नहीं जाता है।
प्री-ऑथराइज़ेशन करवाना पड़ता है, ऑपरेशन से पहले ही समय रखकर,
कागज़ात पूरे कर लो पहले से, आखिरी घड़ी की भागदौड़ से बचकर।
नेटवर्क से बाहर के हॉस्पिटल में, खुद भरने पड़ते हैं पैसे,
फिर बिल और रिपोर्ट जमा करवाकर, बीमा कंपनी से वापस लिए जाते हैं।
सारे बिल, रिपोर्ट और प्रिस्क्रिप्शन, संभालकर रखने पड़ते हैं,
मूल कागज़ात के बिना क्लेम, अस्वीकार भी हो सकता है।
नज़दीकी अच्छा हॉस्पिटल, बीमा के नेटवर्क में हो तो,
कैशलेस सुविधा आसान पड़ती है, पैसों की चिंता नहीं रहती।
पसंदीदा हॉस्पिटल नेटवर्क में न हो तो,
रीइम्बर्समेंट का रास्ता अपनाओ, पैसे वापस मिल जाते हैं।
पॉलिसी लेते समय ही, आंख का ऑपरेशन कवर है या नहीं,
जांच लीजिए अच्छे से, बाद में पछतावा न रहे कोई भी।
वेटिंग पीरियड पूरा हुआ है या नहीं, ये भी देख लीजिए,
प्री-एग्ज़िस्टिंग कंडीशन की शर्तें, ध्यान से पढ़ लीजिए।
सरकारी योजनाओं के तहत भी, मोतियाबिंद का ऑपरेशन होता है,
आयुष्मान कार्ड या दूसरी योजना, पात्रता जांच ली जाती है।
आर्थिक रूप से कमज़ोर मरीज़ों के लिए, ये है अच्छा विकल्प,
क्लिनिक पर पूछ लीजिए, कौन सी योजना लागू होती है साफ।
विदेशी लेंस महंगी है इसलिए, अच्छी ही है ऐसा मत मानो,
भारतीय लेंस भी उतनी ही अच्छी, गुणवत्ता तुलना करके जानो।
डॉक्टर की सलाह और अपनी ज़रूरत, दोनों देखकर तय करो,
ब्रांड के नाम से ज़्यादा, सही चुनाव पर ध्यान धरो।
माता-पिता को टेढ़ा नंबर हो तो, बच्चों में भी संभावना रहती है,
कॉर्निया का आकार विरासत में मिलता है, परिवार में ये बात चलती है।
परिवार में एस्टिग्मेटिज्म हो तो, बच्चों की जांच जल्दी करवाओ,
वंशानुगत जुड़ाव जानकर, नियमित चेकअप करवाओ।
मैकुला पर छोटा छेद हो जाए, बीच की नज़र बिगड़ती है,
सीधी लाइनें टेढ़ी दिखें, और पढ़ने में तकलीफ होती है।
विट्रेक्टॉमी नाम का ऑपरेशन, इस तकलीफ में किया जाता है,
जल्दी पहचान और इलाज से, नज़र ज़्यादातर सुधर जाती है।
डायबिटीज़ या मैकुलर डिजनरेशन में, आंख में इंजेक्शन दिया जाता है,
नाम सुनकर डरने की ज़रूरत नहीं, दर्द बहुत कम होता है।
एक बार से काम नहीं चलता, बार-बार लेना पड़ता है,
नियमित फॉलोअप के साथ ये इलाज, असरदार माना जाता है।
नंबर बहुत ज़्यादा हो तो, रेटिना पतली और कमज़ोर रहती है,
कमज़ोर हिस्से के आसपास लेज़र किया जाता है, रेटिना फटने का खतरा घटता है।
इस इलाज को बैराज कहते हैं, निवारक कदम माना जाता है,
हाई मायोपिया वाले मरीज़ों की, नियमित जांच में ये समझाया जाता है।
डायबिटीज़ के कारण रेटिना की नसें, लीक होने लगती हैं,
लेज़र से उन नसों को बंद किया जाता है, नज़र बचाने में काम आता है।
एक ही बैठक में पूरा नहीं होता, कई बार बैठना पड़ता है,
डॉक्टर के कहे अनुसार फॉलोअप करो, नज़र बची रहती है।
अचानक नज़र बहुत धुंधली हो जाए, या काले बादल दिखें,
डायबिटीज़ या चोट के कारण, अंदर खून भर जाता है।
थोड़ा खून हो तो खुद सोख लिया जाता है, इंतज़ार करना पड़ता है,
ज़्यादा हो तो ऑपरेशन की ज़रूरत, डॉक्टर तय करता है।
एक ही चश्मे में दूर, पास और बीच का, तीनों दूरी दिखती है,
प्रोग्रेसिव चश्मे का फायदा ये है, बाइफोकल जैसी लाइन नहीं दिखती।
शुरुआत के कुछ दिन, चलने में थोड़ी तकलीफ होती है,
सीढ़ियां उतरते समय संभलना, दिमाग आदी हो जाता है धीरे-धीरे।
रूमेटॉइड आर्थराइटिस या ल्यूपस जैसी बीमारियां, आंख पर भी असर करती हैं,
ड्राय आई, स्क्लेराइटिस या यूवाइटिस, साथ होने की संभावना रहती है।
ऐसी बीमारी हो तो आंख के डॉक्टर को, ज़रूर बता दीजिए,
नियमित जांच करवाकर, नज़र का ध्यान रखिए।
भारी वज़न उठाने से, आंख का दबाव बढ़ जाता है,
ग्लूकोमा के मरीज़ों को ये बात, खास ध्यान में रखनी चाहिए।
जिम में भारी वेट लिफ्टिंग टालो, हल्की कसरत ही करो,
सांस रोककर ज़ोर लगाने की आदत, आज से ही छोड़ दो।
कपालभाति जैसी तेज़ सांस की कसरत, ग्लूकोमा में सावधानी से करनी चाहिए,
पेट और छाती पर ज़्यादा ज़ोर पड़े तो, आंख के दबाव पर भी असर पड़ता है।
योग करना हो तो डॉक्टर से पूछ लीजिए, कौन सी कसरत सही है आपके लिए,
धीमे और हल्के प्राणायाम अच्छे हैं, तेज़ और ज़ोरदार से बेहतर।
शीर्षासन या सिर नीचे रखने वाली मुद्राएं, ग्लूकोमा में टालनी अच्छी हैं,
सिर की तरफ खून का दबाव बढ़ता है, आंख के दबाव में भी होता है भारी असर।
योग टीचर को ग्लूकोमा के बारे में बताओ, पहले से ही कर लो बात,
सही मुद्राएं चुनवाओ, इस बात का रखो ध्यान।
नंबर बहुत ज़्यादा हो और रेटिना पतली हो तो,
भारी वज़न उठाने से, रेटिना फटने का खतरा बढ़ जाता है।
बॉक्सिंग, कुश्ती या सिर में झटका लगने वाला खेल,
हाई मायोपिया में टालना अच्छा है, ये बात ध्यान में रखिए ज़रूर।
जंपिंग या झटकों वाली कसरत, रेटिना पर दबाव लाती है,
डॉक्टर से पूछे बिना, भारी कसरत शुरू मत करवाइए।
चलना, हल्की स्विमिंग या साइकिलिंग, ग्लूकोमा और हाई मायोपिया में अच्छा है,
भारी वज़न, तेज़ सांस और सिर नीचे की मुद्रा, टालना ज़रूरी है सही में।
कोई भी नई कसरत शुरू करने से पहले, आंख के डॉक्टर से पूछ लीजिए,
अपनी स्थिति के अनुसार ही सलाह मिले, उसी के अनुसार कसरत कीजिए।
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Dr Dhaval Patel has conducted many eye camps in Africa and visits yearly for the same.